’’टमाटर किस भाव? ’’बड़े-बड़े,लाल-लाल
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टमाटर एक तरफ करते हुए
बुजुर्गवार ने प्रश्न किया।
’’सात रूपए किलो,बाबू जी! ’’सब्ज़ी वाली तराजू सँभालते हुए बोली।
’’सात रूपए किलो,’’सज्जन ने चौंककर प्रति प्रश्न किया।
’’जी बाबू जी,’’ सब्ज़ी वाली थोड़ी सहमी-सी बोली।
’’अरे भाई,हद करते हो तुम लोग,मण्डी में दस रूपए में ढाई किलो मारे-मारे फिर रहे हैं।’’ऐसा कहते हुए भी सज्जन के हाथ टमाटर छाँटने में लगे थे।
’’अरे बाबूजी, मण्डी का भाव रहि ऊ...फेर टिमाटरऊ तौ...देख लेऔ,...केता बढ़िया रहि’’।
’’अरे, तुम लोग भी ना...बताइए बहन जी!
‘‘आप ही बताइए,...अभी तो ज़रा सब्ज़ी सस्ती हुई है, इस सरकार के राज में और ये लोग फिर भी लूट मचाते हैं’’ मैं सब्ज़ी तुलवा चुकी थी। पैसे देते हुए मैंने उनकी तरफ नजर डाली। अच्छे संभ्रांत,पढ़े-लिखे लगे। मुझे, कपड़ों से भी ठीक-ठाक पैसे वाले ही लगे। मैं हल्की-सी मुस्कराकर आगे बढ़ गई।
’’ऐसे ही लोगों की वजह से इन छोटे लोगों का दिमाग खराब हुआ है, चार पैसे आ जाते हैं तो दिमाग ठिकाने नही रहता। बिना मोल-भाव के खरीददारी करेंगे और समझेंगे बड़े‘कूल’ हैं हम’’। मेरे कानों में पीछे से बुजुर्ग की धीमी और तीखी आवाज पड़ी। मेरे कदम रूक गए...जो बात टल गई थी लगा...उसमें उलझना ही पड़ेगा।
मुझे वापस आया देख थोड़ा सकुचाकर नजरें चुरा गए और सब्ज़ियाँ टटोलने लगे। सब्ज़ी वाली भी थोड़ी घबरा गई, पता नहीं उसे किस बात से डर था। दो रूपए ज्यादा ले रहीं थी, इस बात से या मुझ जैसे ग्राहक पर अपनी पोलपट्टी खुलते देख घबरा रही थी। ज्यादातर सब्ज़ी उसी से लेती हूँ, उसका कोई ठेला नही है। बस एक निश्चित जगह सड़क के किनारे प्लास्टिक बिछा,बड़ी सजा-सँवारकर सब्ज़ियाँ रखती है। सब्ज़ी एकदम ताज़ा और बढ़िया होती है। हाँ, कीमती थोड़ी ज्यादा होती है।
उसकी सब्ज़ियों के पास पहुँचते ही रंग-बिरंगे फूलों के बगीचे में पहुँचने का अहसास होता है। लगता है जैसे एकसाथ सारे फूल खिलखिला उठे हों, या हरी-भरी वादियों में पहुँच गए हों और कोई रंगों से भरा दुशाला ओढ़ बाँहे फैलाए आपको बुला रहा हो।
लाल-लाल ताज़ा टमाटर,अपनी चमकती चिकनी त्वचा से किसी बच्चे के गालों की स्निग्धता को मात करते दिखते। झक,सफेद, ताजा मूलियाँ... अपने सर पर हरी पत्तियों का ताज सजाए इठलाती नजर आतीं...। पालक,मेथी,बथुआ,धनिया आदि पत्तेदार सब्ज़ियों को वह इतने करीने से रखती कि लगता...किसी बँगले का करीने से कटा-छँटा मखमली लाँन। मटर... इतनी ताज़ा... और हरी होती कि... उठाकर खाने का मन करने लगे। बैंगन,लौकी,टिंडे इत्यादि अपनी त्वचा से...किसी नवयौवना को चुनौती देते लगते। लब्बोलुबाब यह कि वहाँ पहुँच कर आप सब्ज़ी खरीदने का लोभ संवरण नही कर पाएँगे। खरीदने दो सब्ज़ी गए हैं...लेकर चार ले आएँगे...।
मेरे टहलने के रास्ते में ही, सब्ज़ी वाली से पहले एक और भी सब्ज़ीवाला ठेला लगाता है।
मगर उसकी सब्ज़ियाँ बड़ी बीमार-बीमार सी होती हैं...असमय बुढ़ाए बैंगन, ढेरों झुर्रियों के साथ...इस आस में कि...तेल-बनाए आलू-बैंगन और नाम बहू का होय...। दबे-कुचले से
टमाटर...कुपोषण के शिकार बच्चों की तरह...उनके बीच से झाँकता कोई-कोई लाल टमाटर...
जैसे देहाती,गरीब,कमजोर बच्चों के बीच...कोई स्वस्थ, शहरी बच्चा गलती से पहुँच गया हो।
सूखी,... अपना हरापन खो चुकी...काली-काली काई जैसी क्रीम लगाए भिंडी...
मुरझाई मेथी, पालक... आधी हरी आधी पीली पत्तियों वाला धनिया प्रौढ़ हो चुका होता।... बाकी सब्ज़ियों का भी कुछ ऐसा ही हाल होता उसके ठेले पर... एक अजीब सी मुर्दनी छाई होती। जवानी खो चुकी सब्ज़ियाँ तेल-मसालों के साथ पतीलों में जाने को तैयार बैठी थीं पर ग्राहक उनकी बुढ़ाती देह देख बिदक आगे बढ जाते।
ठेले वाला पानी छिड़क-छिड़क कर उनकी जवानी कायम रखने की कोशिश करता। उससे सब्ज़ी मैं कभी-कभार ही लेती थी...जब मुझे थोड़ी जल्दी होती और सब्ज़ी वाली थोड़ी दूर लगती या... कभी-कभी थोड़ी इंसानियत।... बाकी लोग भी कम ही लेते थे उससे,इसी से बेचारे की सब्ज़ी और बुढ़ाती जाती। लेकिन इधर कुछ दिनों से उसके यहाँ से भी नियमित एक-दो सब्ज़ी ले ही लेती हूँ। बंदा बड़ा व्यावहारिक निकला...मेंरी कमजोर नस पकड़ चुका था...मोल-भाव करती नहीं हूँ, पता नहीं कैसे एक दिन कीमत पूछ ली, बस वह शुरू हो गया बड़े मीठे लहजे में-’’अरे मैडम,आप रोज के ग्राहक हो, आपसे ज्यादा लेंगे’’’...
‘‘नहीं-नहीं, फिर भी...ऐसे ही पूछा’’
‘‘अरे हम जानते नहीं हैं क्या आपको,...आप तो मोल-भाव भी नहीं करती। रोज सब्ज़ी भी लेती हैं और कोई चखचख नहीं...वरना मैडम लोग सब्ज़ी जरा सी लेंगे और कानून दुनिया का बताएँगे’’।
अब उसके ठेले के सामने मेंरे कदम थम ही जाते हैं। उसने एम.बी.ए.की डिग्री तो नहीं ली पर उसकी व्यापारिक बुद्धि की कायल हो गई हूँ।....क्या इंसान को अपनी प्रसंशा इतनी अच्छी लगती है... खै़र।
सब्ज़ी वाली के पास आकर उन सज्जन से मुखातिब हुई-‘‘भाईसाहब माँल जाते हैं क्या’’?
‘‘क्यों’’?
‘‘वहाँ भी मोलभाव करते है’’?
‘‘मैं माँल-वाँल नहीं जाता’’। वे उखड़ गए।
‘‘बड़ी दुकानों, राशन की दुकानों या बाकी चीजों पर पैसे कम कराते हैं’’।
उनका चेहरा थोड़ा लाल हो उठा था-‘‘देखिए मैडम! जो वाज़िब कीमत होती है...उसे देने में हर्ज नहीं है। पर...ये लोग औने-पौने दाम लगाते हैं...सब्ज़ी जैसी चीज इतनी महँगी’’...
उनकी सोच पर पहले तो हँसी आने को हुई...पर फिर गम्भीर चेहरे से उनसे पूछा’’ आप कहाँ कार्य करते हैं, सर’’?
‘‘ज्वैलर हूँ। सब्ज़ी वगैरा मैं नहीं लाता...नौकर ही लाता हैं वो तो इधर से गुजर रहा था, टमाटर अच्छे लगे तो लेने लगा। कल ही नौकर बता रहा था टमाटर दस रूपए में ढाई किलो’’
ज्वैलर सुन चैंक गई...
‘‘सर!आपकी दुकान पर जब लोग गहने खरीदने आते होंगे, आप वाज़िब दाम ही बताते होंगे?
‘‘बिलकुल,हमारा रेट तो सरकार तय करती है।’’
‘‘और मेकिंगचार्ज सर? वो भी सरकार तय करती है’’?
‘‘नहीं,...अब...वो तो कारीगरी के ऊपर है, जैसा काम वैसा मेकिंगचार्ज’’।
‘‘सही है सर, जैसा काम वैसा मेकिंगचार्ज...इसका भी काम देखिए सर इसका सलीका देखिए.. इसकी सब्ज़ियों को देखकर आप खरीदने के लिए लालायित हुए..तो..तो..सर इसका यह मेकिंगचार्ज है टमाटर पर दो रूपए ज्यादा इसका मेकिंगचार्ज मान लीजिए’’।
उनका चेहरा उतर गया तो मैं थोड़े सांत्वना के स्वर में बोली-‘‘ फिर..फिर इससे इसका घर
चलता है, सर! आपके लिए दो रूपए.. कोई बड़ी बात नहीं..लेकिन इन बच्चों की थाली में सूखी रोटी के साथ..टमाटर की चटनी भी आ जाए शायद’’...
उनके चेहरे की बढ़ती झेंप को देख मैं आगे बढ़ गई। पर मन नहीं माना और पलट कर देखा
मैं सुखद आश्चर्य से भर उठी, सब्ज़ी वाली मुस्कराते हुए उनके थैले में टमाटर डाल रही थी।
इला सिंह
’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’
(7839040416)ilasingh1967@gmail.com
एम.ए.(इतिहास),बी.एड.
कहानी संग्रह ‘‘मुझे पंख दे दो’’ नोशन प्रेस के उपक्रम प्रतिबिंब से प्रकाशित । कथादेश , परीकथा,अक्षरपर्व,कथाक्रम,विभोम स्वर,अन्विति,संस्पर्श ,त्रिवेणी,सेतु (पिट्सबर्ग से प्रकाशित), आर्य कल्प,किस्सा 32 में कहानियाँ और किस्सा 33 में आलेख प्रकाशित। लघुकथा,काम में लघुकथा। के.बी.एस. प्रकाशन से प्रकाशित साँझा संग्रह में कहानी प्रकाशित ।
इला सिंह
’’’’’’’’’’’’’’’’’’
104Ghanshyam Palace Near Indian Oil Petrol Pump Munshi Pulia Chauraha Sector-16,Indira Nagar Lucknow
834 दिन पहले 30-Apr-2024 6:42 PM
अविरल धारा का प्रख्यापन
25जनवरी2024को
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साहित्यिक हिंदी पत्रिका अविरल धारा का औपचारिक प्रख्यापन हरदोई जिले में हुआ। इसका प्रख्यापन 90.4 एफएम रेडियो जागो के अध्यक्ष श्री अभय शंकर गौड़ जी द्वारा किया गया। इस अवसर पर साहित्यकार एवं पूर्व प्रधान आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर हरिद्वार श्री डी के पांडेय विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित रहे एवं जिले के स्थापित व नवोदित साहित्यकारों और कवियों में सर्व श्री बी एस पांडेय जी, मनीष मिश्र जी, गीता गुप्ता जी, मीतू मिश्रा जी, पल्लवी मिश्रा जी की ओजपूर्ण उपस्थिति रही। कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित नवोदित रचनाकार रूबी ने नीलम नदी के पुनरोत्थान व हरदोई जिले पर आधारित स्वरचित कविताओं का पाठ कर सभी का ध्यान आकर्षित किया।
अविरल धारा एक विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका है। इस पत्रिका का उद्देश्य हिंदी साहित्य को आधुनिक परिवेश में उत्तरोत्तर प्रगति एवं गौरवशाली इतिहास को गरिमामयी स्तर पर पहुंचने हेतु, सूक्ष्म ही सही, अभिदान करना है। यह डिज़िटल पत्रिका पूर्णतः गैर राजनीतिक परिवेश में रह कर, ये प्रयास करेगी की हिंदी साहित्य के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करे और उन सभी को एक मंच मिले जो हिंदी साहित्य की धारा की अविरलता चाहते हैं।
अविरल धारा की संपादक ज्योत्सना सिंह ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए बताया कि डिज़िटल युग में यह हिंदी साहित्यिक क्षेत्र के डिज़िटलीकरण का अनूठा प्रयास है जो अविरल धारा के रूप में प्रवाहित होता रहेगा। पत्रिका के समाचार प्रभाग की कार्यकारी श्रीया शर्मा ने पत्रिका के स्वरूप और उद्देश्य की विस्तार से जानकारी दी एवं मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि तथा समस्त साहित्यकारों एवं कवियों को शाल ओढ़ाकर एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर स्वागत किया।
पोर्टल के क्रिएटर सुंदरम पांडेय ने पत्रिका के तकनीकी पहलुओं को बताया। एनजीओ सचिव, दीपा शर्मा,ने कार्यक्रम के अंत में अतिथियों का आभार व्यक्त किया।
अविरल धारा पत्रिका की लाॅन्चिंग के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकारों,कवियों व साहित्यकारों ने अपने विचार व अनुभव साझा किये और पत्रिका की सफलता की कामना करते हुए अपने मूल्यवान मार्गदर्शन का आश्वासन भी दिया।
श्रीया शर्मा
परिचय
नाम-श्रीया शर्मा
पुत्री-श्री मनोज कुमार शर्मा
पता-1-ए,लक्ष्मीपुरवा हरदोई
शिक्षा-परास्नातक पत्रकारिता
एवं माँस-काँम
कार्यरत-सहायक प्रवंधक,ब्रांड स्ट्रेटजी,
गुरूग्राम(हरियाणा)
834 दिन पहले 30-Apr-2024 7:12 PM
अविरल धारा का प्रख्यापन
25जनवरी2024को
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साहित्यिक हिंदी पत्रिका अविरल धारा का औपचारिक प्रख्यापन हरदोई जिले में हुआ। इसका प्रख्यापन 90.4 एफएम रेडियो जागो के अध्यक्ष श्री अभय शंकर गौड़ जी द्वारा किया गया। इस अवसर पर साहित्यकार एवं पूर्व प्रधान आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर हरिद्वार श्री डी के पांडेय विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित रहे एवं जिले के स्थापित व नवोदित साहित्यकारों और कवियों में सर्व श्री बी एस पांडेय जी, मनीष मिश्र जी, गीता गुप्ता जी, मीतू मिश्रा जी, पल्लवी मिश्रा जी की ओजपूर्ण उपस्थिति रही। कार्यक्रम में विशेष रूप से आमंत्रित नवोदित रचनाकार रूबी ने नीलम नदी के पुनरोत्थान व हरदोई जिले पर आधारित स्वरचित कविताओं का पाठ कर सभी का ध्यान आकर्षित किया।
अविरल धारा एक विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका है। इस पत्रिका का उद्देश्य हिंदी साहित्य को आधुनिक परिवेश में उत्तरोत्तर प्रगति एवं गौरवशाली इतिहास को गरिमामयी स्तर पर पहुंचने हेतु, सूक्ष्म ही सही, अभिदान करना है। यह डिज़िटल पत्रिका पूर्णतः गैर राजनीतिक परिवेश में रह कर, ये प्रयास करेगी की हिंदी साहित्य के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करे और उन सभी को एक मंच मिले जो हिंदी साहित्य की धारा की अविरलता चाहते हैं।
अविरल धारा की संपादक ज्योत्सना सिंह ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए बताया कि डिज़िटल युग में यह हिंदी साहित्यिक क्षेत्र के डिज़िटलीकरण का अनूठा प्रयास है जो अविरल धारा के रूप में प्रवाहित होता रहेगा। पत्रिका के समाचार प्रभाग की कार्यकारी श्रीया शर्मा ने पत्रिका के स्वरूप और उद्देश्य की विस्तार से जानकारी दी एवं मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि तथा समस्त साहित्यकारों एवं कवियों को शाल ओढ़ाकर एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर स्वागत किया।
पोर्टल के क्रिएटर सुंदरम पांडेय ने पत्रिका के तकनीकी पहलुओं को बताया। एनजीओ सचिव, दीपा शर्मा,ने कार्यक्रम के अंत में अतिथियों का आभार व्यक्त किया।
अविरल धारा पत्रिका की लाॅन्चिंग के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकारों,कवियों व साहित्यकारों ने अपने विचार व अनुभव साझा किये और पत्रिका की सफलता की कामना करते हुए अपने मूल्यवान मार्गदर्शन का आश्वासन भी दिया।
श्रीया शर्मा
परिचय
नाम-श्रीया शर्मा
पुत्री-श्री मनोज कुमार शर्मा
पता-1-ए,लक्ष्मीपुरवा हरदोई
शिक्षा-परास्नातक पत्रकारिता
एवं माँस-काँम
कार्यरत-सहायक प्रवंधक,ब्रांड स्ट्रेटजी,
गुरूग्राम(हरियाणा)
834 दिन पहले 30-Apr-2024 7:19 PM
मौसमी बीमारियां, घरेलू उपचार
शीत
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ऋतु जाने को है तथा ग्रीष्म ऋतु आ रही है इस बीच के काल को संधिकाल कहते हैं। इस संधिकाल में मनुष्यों में ऋतु परिवर्तन के कारण शरीर में सामान्य बीमारियां देखने को मिलती हैं, यदि इस समय सावधानी न बरती जाए तो शरीर में अनेकानेक रोग उत्पन्न होने में देर नहीं लगती है।
अतः इस काल में छोटी-छोटी सावधानियां रखी जायें तो बेहतर होगा। प्रायः इस काल में जुक़ाम, बुख़ार, बदनदर्द, ख़ाँसी, आदि सामान्य बीमारियां होती है इनके उपचार हेतु निम्न उपायों को अपनाना चाहिए-
1. इस अवधि में गरम कपड़ों का त्याग एकाएक नहीं करना चाहिए। धीरे-धीरे गरम कपड़ो का त्याग करना चाहिए।
2. अधिक ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए। ज्यों-ज्यों गरमी का एहसास हो धीरे-धीरे ठंडे पानी का सेवन करना चाहिए।
3. नहाते समय भी ठंडे पानी से परहेज करना चाहिए जब ग्रीष्म ऋतु विधिवत आरम्भ हो जाये तो शीतल जल से स्नान आदि करने का विधान है। यदि कुछ समस्या उत्पन्न हो ही जाय तो इन नुस्खो का सेवन करना चाहिए।
(क)अज़वाइन का पानी पीने से सिरदर्द की समस्या में राहत मिलती है।
(ख)चाय में अदरक, तुलसी की पत्ती, काली मिर्च का सेवन करने से जुक़ाम, ख़ाँसी, बदन दर्द में राहत मिलती है।
(ग) अज़वाइन को गर्म पानी में पकाकर भाप लेने से सर्दी,ख़ाँसी,जुक़ाम में राहत मिलती है ।
(घ) यदि भूख कम लग रही हो तो अदरक उबालकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से पर्याप्त भूख लगेगी।
साथ ही मौसमी फलों का सेवन भी करें जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करेगें।
डाॅ0 अरूण कुमार शर्मा
परिचय
डाॅ० अरूण कुमार शर्मा लगभग 34 वर्ष की सेवा के बाद अपर निदेशक, आयुर्वेद सेवाओं के पद से सेवा निवृत्त हुए, बाल्यावस्था से ही हिन्दी साहित्य में रूचि रही। इनके प्रेरणा स्त्रोत स्व० श्री महेश चन्द्र ‘सरल’ रहे, जो कि ‘हरदोई समाचार’ साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक थे, डाॅ० अरूण कुमार शर्मा वर्ष 1972-74 तक ‘‘तरूण-मित्र’’ पत्र के संपादक मंडल में रहे, उपरोक्त पत्रों में श्री शर्मा की कविताएं एवं लेख छपते रहे। ‘नंदन’ बाल पत्रिका में भी पुरस्कृत कहानी छपी। ‘‘झील का दर्द’’ नामक कहानी को राजस्थान में पुरस्कृत किया गया।
834 दिन पहले 30-Apr-2024 10:13 PM
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स्वप्न को हकीकत में तब्दील होते हुए देखना बेहद सुखद होता है। ‘‘अविरलधारा’’ एक ऐसा ही स्वप्न बनकर साहित्यिक पत्रिका के रूप में साकार हुआ है। साहित्य समाज का दर्पण है यह तो हम बीते वक्त से सुनते चले आ रहे हैं। ‘‘अविरलधारा’’ पत्रिका का दर्पण थोड़ा और पारदर्शी है। यह पत्रिका अपने आप में साहित्य और समाज के साथ ही साथ समाचार, धर्म और स्वाद को भी अपने भीतर समेटे हुए है।
‘‘अविरलधारा’’ एक डिज़िटल पत्रिका है। आज हमारा पूरा जीवन नेट के तार-तार से जुड़ा हुआ है। जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह से तेजी से होते इस डिज़िटलीकरण के भी दो पहलू हैं और हम भी उन दोनों पहलुओं से अलग नहीं हैं। फिर भी हम खुद को विशेष बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे। यह ‘‘टीम अविरलधारा’’ का आप से वादा है।
आज समाज में लिखा बहुत जा रहा है। उसे लोगों तक पहुँचाने के रास्ते भी सुगम हुए हैं किंतु हर प्लेटफाॅर्म पर हमारी लेखनी कितनी सुरक्षित है, यह प्रश्न बहुत बड़ा है। हम आपके लेखन के सुरक्षित होने का दावा तो नहीं करते किंतु हमारी पूरी ‘‘टीम अविरलधारा’’ यह हलफ़ जरूर उठाती हैं कि आपका लेखन यहाँ सुरक्षित रहेगा।
हमने दो स्तंभ ‘नई कलम’ और ‘नन्हीं क़लम’ के नाम से भी पत्रिका में समाहित किए हैं। यह हमारे उन क़लमकारों के लिए हैं जिन्होंने अपने मनोभावों को शब्दों का जामा पहनना अभी शुरू ही किया है। उन्हें हम प्रकाशित होने का स्थान देंगे ताकि ज्यादा से ज्यादा उनको पढ़ा जा सके, उनके हृदय में उठते भावों को समझा जा सके। यदि नई क़लम स्वयं इजाज़त देगी तो उसके काव्यगत या कथागत भावों को काव्य और कथा की कसौटी पर कसकर उसकी लेखनी को हमारे अनुभवी क़लमकार परिष्कृत भी करवा सकते हैं।
लेखन कार्य एक दुरुह कार्य होते हुए भी बेहद सुकून भरा काम होता है। किसी भी रचना का जन्म होता ही तब है जब वह लेखक के हृदय के तारों को झंकृत करके उसे विवश करती है कि वह अपने शब्दों की माला को विचारों के माध्यम से वरण करे। इस सुंदर समागम से ही लेखनी चलती है। अविरलधारा की संपादक होने के नाते मैं माँ शारदे से विनय करती हूँ कि वह पत्रिका में आने वाली हर कलम पर अपना वरदहस्त् रखें। नन्हीं कलम को हम बिल्कुल वैसा ही रखना चाहते हैं जैसा हमारे बाल कलाकार हमको भेजेंगे। बच्चे हमारा भविष्य होते हैं और हम अपने भविष्य को उनके देखे स्वप्न में स्वच्छंद विचरने देंगे। बच्चे पत्रिका में स्वयं की लिखी कविता, कहानी या चित्र कुछ भी भेंजें उनका खुले दिल से स्वागत है।
प्रमुख रूप से हरदोई शहर के व्यापक साहित्यिक समाज के लिए यह पत्रिका, टीम ‘‘अविरलधारा’’ ने अपना कीमती वक्त देकर तैयार की है। वैसे तो इसमें सभी साहित्यिक मित्रों का स्वागत है। पत्रिका का उद्गम शहर हरदोई का होने की वजह से हम हरदोई के साहित्यकारों का सहयोग विशेष रूप से चाहेंगे। यह आपकी अपनी पत्रिका है। आपके शहर की
रौशनाई है अतः आपके सहयोग के बिना इस कली को कुसुम बनने में बहुत वक्त लग जाएगा।
आपका सहयोग रहा तो यह पत्रिका जल्दी ही विकसित पत्रिकाओं की श्रेणी में अपना स्थान बना लेगी, ऐसा हमारा विश्वास है। एक बात और हम वक्त-वक्त पर साहित्यिक गोष्ठियाँ करते रहेंगें। उन गोष्ठियों में हम पत्रिका में शामिल रचनाकारों को मंच देने का भी वादा करते हैं।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि सभी का जीवन इन्द्रधनुषी हों। स्वस्थ रहिए मस्त रहिए। सुंदर लिखिए और खूब पढ़िए क्योंकि पढ़ेंगे आप तभी तो रचेंगे आप।
अविरलधारा एक टीम के रूप में कार्य करती है। इसके सभी कार्यकर्ता अवैतनिक हैं। हम सबने जो सपना देखा उसे पूरा करने के लिए हम तन-मन और धन से समर्पित हैं।
टीम अविरलधारा के पदाधिकरियों की सूची निम्न है।
1. ज्योत्सना सिंह (प्रधान-संपादक)
2. श्रीया शर्मा (मुख्य कार्यकारी एवं प्रभारी समाचार प्रभाग)
3. दीपा शर्मा (संयोजिका)
4. सुन्दरम पाण्डेय (आई0टी0 विश्लेषक एवं मुख्य तकनीकी अधिकारी)
5. मनोज कुमार शर्मा (संस्थापक)
हम अभार व्यक्त करते हैं ‘जोविएल डिज़िटल सर्विसेस’ नोएडा के मुख्य तकनीकी अधिकारी श्री सुंदरम पाण्डेय जी का जिनके मार्गदर्शन में उनकी पूरी टीम ने इस पत्रिका के डिज़िटलीकरण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया जा रहा है।
आपके सहयोग की आकांक्षी आपकी अपनी संपादक
ज्योत्सना सिंह
ओमेक्स,गोमती नगर लखनऊ।
साहित्यिक परिचय
नाम-ज्योत्सना सिंह
जन्म-06-02-1969
माता-स्वर्गीय श्रीमती कमला सिंह
पता-स्वर्गीय श्री अनिरूद्ध बहादुर सिंह
शिक्षा-परा स्नातक हिन्दी साहित्य
मो०न०-8354016004
सम्मानः शारदेय सम्मान, विश्व हिन्दी रचनाकार मंच से काव्य अमृत सम्मान, के.जी.साहित्य सम्मान से सारथी सम्मान, lcww कहानी प्रतियोगिता में2023और2024दोनों ही बार प्रथम पुरस्कार।
अखिल भारतीय उत्थान परिषद सम्मान से साहित्य श्री सम्मान।
साहित्यिक परिचय-‘‘सारंग’’नाम से लघुकथा संग्रह प्रकाशित।
अहा! जिंदगी, दैनिक जागरण, नवभारत टाईम्स,अमर उजाला, रूपायन,कथा क्रम,वनिता,HPS
पत्रिका,सोच-विचार,विभोस-स्वर,गौतमी,कलमकार मंच और बाल पत्रिका चिरैया एवं देवपुत्र आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में कई बार रचनाओं का प्रकाशन।
पिट्स बर्ग अमेरिका की ई-पत्रिका सेतु में अनेकों बार रचना प्रकाशित,रचनाकार मंच,अभिव्यक्त
प्रकाशन, जनखबर लाइव, आदि कई पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
पुस्तकों तथा पत्रिका के उपसंपादन का कार्य
रेडियो अमेरिका से तीन लघुकथाओं का प्रसारण
इंडिया वाॅच चैनल पर काव्य पाठ।
AIR FM बरेली AIR लखनऊ से लघुकथा तथा चार बार कहानी पाठ। गाथा मंच पर कथा पाठ।
दूरदर्शन लखनऊ से इंटरव्यू प्रसारित।
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833 दिन पहले 01-May-2024 12:01 PM
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स्वाहा! स्वाहा! स्वाहा! की ध्वनि प्रतिध्वनि उसकी कुटिया से आती हुई बाहर के माहौल को भक्तिमय कर रही हो ऐसा तो नहीं था। क्योंकि वो जगह भक्ति के लिए उपयुक्त ही नहीं थी। वह तो जीवन के अटल सत्य को दर्शाने वाला स्थान था। शमशान के भीतर थी उसकी कुटिया और वह थी 'शमशान की सन्यासिनी' पूरे माहौल में चमड़ी के जलने से आने वाली गंध के साथ उसकी मदिरा की दुर्गन्ध ने वातावरण को वीभत्स सा बना रखा था। हर आने वाली लाश के परिजनों को उसे भेंट चढ़ानी होती थी, नहीं तो यहाँ से जाने वाला हर आदमी परेशान रहता है, ऐसा मिथक फैला रखा था उसने और शमशान के कर्मचारियों ने।
काले कपड़े का एक लम्बा झिंगोला जैसा वस्त्र काले घने लंबे बाल और चेहरे पर काले ही रंग का लेप उसकी छवि को डरावना सा बनाते थे। उसकी आँखें शराब के नशे में यूँ लाल रहती जैसे दो दहकते हुए कोयले के अंगार जिसको देखने मात्र से उसके अंदर की आग की दहक का पता चलता था। जितनी क्रूरता और कठोरता वह अपने व्यक्तित्व में ला सकती थी, वह सब उसने अपने में समाहित किया हुआ था। बरसों से वक्त मौसम या माहौल कुछ भी रहा हो पर सन्यासिनी ने अपनी पूजा में कोई भी विघ्न नहीं आने दिया था। शमशान के लोग जानते थे कि वह कोई सिद्धि प्राप्त करना चाहती है, जिसकी वजह से वह शमशान की देवी का हवन और अर्चना रात्रि भर करती है। भोर में शमशान आने वाली पहली अर्थी के दर्शन करके ही वह मधुपान करती है।
आज भी वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त थी। हवन करके शमशान की सीढ़ियों से उतरती हुई पहली अर्थी के दर्शन करने को वह पास आई ही थी कि उसके पाँव ठिठक गये। इतने सालों में आज पहली बार हुआ कि वह किसी अर्थी को देखकर विचलित हुई हो।
ये क्या मधु दीदी! पूरे सोलह श्रृंगार के साथ दुनिया से विदा हो गई। अभी भी गले में वही मोहर पहने है। एक पल को ठिठके अपने कदमों को उसने बड़ी कठोरता से संभाला और अपने नजराने के तौर पर गले से वो मोहर उतारने लगी कि एक किशोर की मधुर वाणी ने उसे रोकते हुए कहा-" आप ये न उतारें मेरी अम्मा की प्रबल इच्छा थी की वह चिता पर इसे पहन कर ही जलें। आपको इसके बदले में और जो चाहिए बता दीजिए मैं दे दूँगा-"। उसने उस नवयुवक को नजर भरकर देखा और दिल को कठोर कर बोली-" हम यही लेंगे,नहीं तो मेरी पूजा और तेरी ये चिता दोनों की आग में दहक पूरी न होगी"। नवयुवक ने सहमें हुए शब्दों में कहा-" मैंने अपनी अम्मा को वचन दिया था। वह कहती थीं इसमें उनकी जान बसती है"। उसे बीच में ही फटकारते हुए वह बोली-" हाँ, तो जब जान ही न रही तब इसका क्या"?
इतना कहकर सन्यासिनी ने अब तक के रुके हुए हाथ को आगे बढ़ाया ही था कि नवयुवक घुटनों पर बैठ उसके आगे हाथ जोड़ कर विनती करने लगा-" मुझे मेरी अम्मा को दिया वचन पूरा कर लेने दीजिए"। उसके निर्दोष मुखड़े को देखकर वह एक पल को फिर विचलित हुई कठोरता से उसने लाश के गले से वो मोहर उतार ली। ये देख किशोर बिलख उठा, परिजन उसे कुछ समझाते कि सन्यासिनी ने मोहर वापस रख लाश के माथे को चूम लिया और अपनी कुटिया की तरफ तेजी से बढ़ गई। शराब की गंध और चमड़ी जलने की दुर्गंध से पूरे वातावरण में जुगुप्सा का माहौल था। लकड़ियों से चिता सजाई जा रही थी।
अपनी कुटिया में आकर वह मधुपान करने लगी। वह जितनी भी शराब पीती उसकी व्याकुलता
उतनी ही बढ़ती जाती। आज वह खुद को नशे में धुत्त कर देना चाह रही थी। पर नशा था की उस पर असर ही न कर रहा था। वह अपने पूरे होशो -हवास में बीस साल पीछे की जिन्दगी
के पन्नों को अपने समक्ष फड़फड़ाते हुए देख रही थी। गोरा चिट्टा रंग सुकोमल सुंदर काया
घने लंबे बाल और गोल-गोल मुखड़े पर बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आँखें। सुंदरता के सारे
मायने पर खरी उतरती सुधा। अपने स्वभाव में भी चंचल तितली सी खुशमिजाज लड़की थी।
उसके ठीक विपरीत थी उसकी मधु दीदी सांवला रंग घुंघराले बाल और तुनक मिजाज स्वभाव हर बात को दिल में रख कर बदला लेने जैसी प्रवृत्ति थी। सुधा थी कि अपनी मधु दीदी पर जान निछावर करती थी।
मधु दीदी को उसके रंग-रूप से कष्ट तो शुरू से ही था। पर वक्त जब ब्याह का आया और हर कोई उसके लिए न बताकर रिश्ता सुधा के लिये बताने लगा तो उसकी इर्ष्या और बढ़ने लगी थी। किस्मत से एक अच्छा रिश्ता मिला और मधु का विवाह हो गया। मधु अब बहुत खुश थी क्योंकि उसका विवाह एक बहुत ही संपन्न घर में हुआ था। वक्त बीता और मधु के पाँव भारी हुए। जब यह बात उसके मायके पहुँची तब सबसे ज्यादा खुश सुधा ही हुई। फागुन माह लग चुका था मधु की ससुराल से सुधा को होली खेलने का बुलावा आया तो सुधा बहुत खुश हुई। मधु दीदी की ससुराल जाने के लिए पिता से जिद करने लगी। जब लाड़ली बिटिया की जिद पर पिता ने हाँ कर दी तब माँ बोली भी थी-"सुधा को मत भेजो। एक तो जवान बिटिया ऊपर से त्यौहार वह भी होली का न जाने क्यों मुझे ठीक न लग रहा"। क्या ठीक न लग रहा अम्मा, होली तो त्यौहार ही जीजा-साली का है। हम तो जायेंगे मधु दीदी के यहां होली खेलने"। अपनी लाड़ भरी बातों से अम्मा को मनाकर वह मधु दीदी की ससुराल जाने की तैयारी करने लगी कि तभी अम्मा ने गहनों की अलमारी खोल उसे एक चेन पहनने को देते हुए कहा-"लो इसे पहन लो त्यौहार में बहन की ससुराल नंगे गले जाओगी तो लोग क्या कहेंगे"?
तभी गहनों के बीच रखी चमकती सोने की मोहर देख वह बोली-"अम्मा, ये भी चेन में डाल दो न इसे हम पहनेंगें।"न बिटिया न,ये तो मधु को पसंद है। जब उसका बच्चा होगा तब हमने उसे देने का वादा किया है। ये न पहन बिटिया उसे अच्छा नहीं लगेगा"।
सुधा ने अम्मा के हाथ से मोहर लेते हुए कहा-"जब दीदी के बच्चा होगा तब दे देना। तब तक हम इसे पहन कर जीजा जी पर जरा रौब तो झाड़ लें"। खिलखिलाते हुए वह उस सोने के टुकड़े को पहनकर मधु दीदी की ससुराल होली खेलने क्या गई कि उसकी जिंदगी ही विष हो गई। ससुराल में सब उसे देख जितना खुश हुए मधु उतना ही जल-भुन गई। सुधा मेहमान थी और पहली बार आई थी। सब सुधा को ही पूछ रहे थे। मधु की तरफ लोगों का ध्यान थोड़ा कम क्या हुआ कि वह तो बिफर ही पड़ी और सुधा को एकांत में ले जाकर बोली-" ये तूने क्यों पहनी? यह तो अम्मा ने हमको देने को कहा था"। सुधा ने अपनी मधु दीदी को प्यार से थपकी देते हुए कहा-"हाँ,हाँ जब बच्चा आएगा तब तुम ले लेना"। तभी उसके जीजा जी वहाँ आ गए और बोले-"क्या खुसुर-फुसुर चल चल रहा है दोनों बहनों में"? मधु गुस्सा छुपाते हुए मुस्कुराकर बोली-"ज्यादा मेरी बहन के पीछे न पड़ो"। सुधा ने चुहल करते हुए कहा-"पड़ो जीजा जी होली का माहौल है। होली तो होती ही जीजा-साली की है। क्यों दीदी है न"?
उसके अल्लहड़पन को देखकर उसके जीजा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेर दिया। यह सब मधु के बर्दाश्त के बाहर हो गया। बहन के प्रति बचपन से भरी ईर्ष्या और मोहर के प्रति लालच ने विकराल रूप धर लिया। उसने रंग वाले दिन सुधा को धोखे से शराब पिला दी और नशे की हालत में उसे पीछे के कमरे में बंद कर दिया। खुद रंग का मजा लेने लगी। पर वक्त को तो कुछ और ही मंजूर था। अपनी साली को रंग खेलते न पाकर उसे खोजते हुए उसके जीजा जी उस कमरे तक पहुँच गये। नशे में मदमस्त हो रही सुधा बेकाबू हुई जा रही थी भंग का रंग जीजा जी पर भी अच्छा खासा चढ़ा हुआ था। वह उसके रूप में ऐसा खो गए कि नशे ने रिश्तों की सीमा ही पार कर दी। घर की नौकरानी ने ये खबर मधु को दी तो होली के सारे रंग स्याह हो गये। वह पूरे घर के साथ उस कमरे में जा पहुँची। गुस्से में उसने सुधा और अपने पति के संबंधों के चिथड़े उड़ा दिये। बदहवास सुधा को उसी हालत में घर से निकाल
दिया। पति तो पुरूष था उसका कुसूर का पलड़ा हल्का कर दिया गया। सुधा एक तो स़्त्री वह भी पराए घर की ऊपर से नशे की हालत में कहाँ क्षम्य था उसका कसूर? मधु दीदी ने अपने घर के पट उसी क्षण उसके लिये बंद कर दिये। सुधा निर्लज्जता का दाग दामन पर लेकर कहां जाती। उस ढलते दिन के धुंधलके में भटकती हुई वह जा पहुँच औघड़ साधुओं की एक टोली में। रिश्तों की जो डोर उससे टूटी थी। उसका जाल बिछाने वाली उसकी अपनी ही बहन थी। यह बात उसे कहाँ पता था? वह तो सारा दोष अपने नशे को दे खुद को ही कोस रही थी। यही वजह थी उसने खुद को बस्ती से दूर औघड़ सन्यासियों के साथ दर-दर का राही बना दिया और खुद को शराब का आदी। औघड़ की दीक्षा देने वाले उसके गुरू ने ही उससे कहा था कि शमशान में रहकर वह देवी की उपासना करे तब ही उसे अपने किए अपराध से निजात इस जीवन में मिल जाएगी नही तो रिश्ते कलंकित करने वाला न जाने कितने जन्मों तक इसका दंड भोगते रहते हैं। वह नशे से थर-थर काँप रही थी कि किशोर उसकी कुटिया तक आ पहुंचा और बोला-"आपने कोई अपराध नहीं किया मेरी अम्मा की ईर्ष्या ने आपको अपराधी बनाया। मेरे पिता ने मेरी अम्मा को कभी माफ नहीं किया और वह घर में रहते होते हुए भी सन्यासी का जीवन जीते हैं। मेरे पिता ने मुझे आप से आशीर्वाद लेने को कहा है। वह जो दूर गेरूए वस्त्र में खड़े सन्यासी हैं वह मेरे पिता है"। यह सब सुन सन्यासिनी सुधा की दहकती अंगारों सी आँखों से जलते हुए अश्रु धारा का सैलाब फूट पड़ा। उसने वहाँ रखे अपने त्रिशूल को अपनी छाती में उतारते हुए कहा-"रिश्तों के रंग को बदरंग करने की मेरी सजा आज पूरी हुई"। स्याहा हो चुकी सुधा के इर्द-गिर्द लहू की रक्तिम धारा फूट पड़ी। वातावरण और भी भयावह हो गया।
ज्योत्सना सिंह
गोमती नगर लखनऊ
833 दिन पहले 01-May-2024 12:04 PM
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‘‘
उदासीनता,
निष्ठुरता
उपेक्षा,
तुमसे मिले ये तीन प्रश्न जब भी हल करने बैठा हूँ
उत्तर में,
आसूँ ही निकले हैं।।
दिनेश कुमार ‘‘शलभ’’
परिचय
श्री डी० के० पाण्डेय जी, सिविल डिफेन्स विभाग में सहायक उपनियंत्रक पद से सेवानिवृत्ति के बाद आर्य वानप्रस्थ आश्रम, ज्वालापुर, हरिद्वार में प्रधान के रूप में अनेकों बार निर्वाचित हुए हैं एवं वर्तमान में भी इसी आश्रम में सेवा कार्य कर रहे हैं। अपने कार्यकाल में उन्होंने आश्रम में हिन्दी एवं संस्कृत के काव्य सम्मेलनों का आयोजन किया है। हिन्दी साहित्य में रूचि बाल्यावस्था से ही रही है एवं 14 वर्ष की उम्र में पहली रचना लिखी। इन पर अपने पिता स्व० श्री राम शर्मा जी का प्रभाव रहा जो कि हिन्दी प्रवक्ता थे। शासकीय सेवा काल में भी इन्होंने अनवरत रूप से साहित्य मंचो को साझा किया हैं।
833 दिन पहले 01-May-2024 12:09 PM
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अरमानों का फूँस,भावों का ढेर,
दुखों की सामिग्री,
करूणा का तरल और ज्वलन पदार्थ,
अर्थात् एक चिता का मार्मिक प्रारूप।
जिसे सामाजिक नियमों की,
दीपशलाका से अग्नि दे दी गई,
तनिक क्षणों में ही भावों।
अरमानों और कल्पनाओं की चिता धधक उठी
लपटों के घेरे में जल-जल कर राख हुई,
तभी अचानक उसी राख के ढेर से धुयें,
के गोल-गोल गुबार उठे,
लेकिन वह धुआँ नहीं,
जिन्दगी के अश्रु थे।
तरल नहीं शुष्क थे,
इसीलिए ढेर पर नही ऊपर उठ,
रहे थे जिनमें एक मूक ध्वनि थी,
जिन्दगी जुआँ है।।
दिनेश कुमार ‘‘शलभ’’
833 दिन पहले 01-May-2024 12:11 PM
बंटवार,(मौलिक
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रचना)
आओ भईया खेत खाली, व्यापार सीजन ऑफ है,
अपना तुम हिस्सा बंटा लो,जो हमारे पास है।
माता-पिता ने संजोया, आपका अधिकार है,
जो भी हिस्से में मिलें, सबको वही स्वीकार है।
घर-खेत बांटो और गृहस्थी, बैंक का भी देखना,
व्यापार और व्यवहार बांटो, चल अचल का लेखना।
घर का मुखिया बड़ा भाई, आज वह मजबूर है,
न चाहते भी वह करे, दुनिया का यह दस्तूर है।
बेईमान कहलाता वही, खेती बिजनेस जो करें,
लाभ के संग हानि होती, जो न कोई चित धरें।
सिर्फ भौतिक साधनों से, सुख नहीं मिल पाएगा,
अपनो के बिना सूना सफर, रह रह के मन पछताएगा।
‘परदेशी’कहता हिस्सा बांटो, दिल नहीं दल बांटना,
वस्तु का एवरेज लगा लो, बेकाम कर ना काटना।।
रचयिताः-
सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’
कवि/लेखक,पत्रकार (हिन्दुस्तान)
राष्ट्रीय प्रवक्ताः- सनातन धर्म प्रचार महासभा
ब्लाक अध्यक्ष अहिरोरीः-हरदोई पत्रकार एसोसिएशन
833 दिन पहले 01-May-2024 12:15 PM
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अब मुझे यकीन हो गया,
आदमी मशीन हो गया।
दौड़ा ही जा रहा था, अंधी सी दौड़ में,
जब होश आया, देखा अपने थे दौड़ में ।
अपना पराया देखा अपना मिला नहीं,
ओ जिन्दगी के मालिक तुझसे गिला नहीं।
झूठे थे उसके वादे, ना अच्छे थे इरादे,
दिन रात खटते-खटते, ईर्ष्या में जलते जलते।
कर्म से मलीन हो गया,
आदमी मशीन हो गया।
संसार में जो आया है जाना उसे पड़ेगा,
डोली पे जो चढ़ा है अर्थी पे भी चढ़ेगा।
वो काल से बचा न बाँधे था काल पाटी,
माटी से दूर भागे मिल जायेगा वो माटी।
झूठै है उसका लेना, झूठै है उसका देना,
झूठै है उसका भोजन, झूठै लगे चबेना।
झूठ का मुनीम हो गया, आदमी मशीन हो गया।।
राजकुमार दीक्षित
परिचय
नाम-राजकुमार दीक्षित
पिता-श्री रामशरण दीक्षित
पता-पो0मवई खुर्द,माल,लखनऊ
शिक्षा-सिविल इंजीनियर
जन्म-02/10/1972
रूचि-काव्य सृजन
प्रकाशित पुस्तक-समय का यथार्थ(अमेजॉन पर उपलब्ध है)
833 दिन पहले 01-May-2024 12:18 PM